इस हफ्ते ग्लोबल मार्केट्स में तेज़ सेल-ऑफ़ देखने को मिला, जिससे क्रिप्टोकरेंसी, इक्विटीज़ और यहां तक कि पारंपरिक सुरक्षित निवेश जैसे सोना और चांदी भी प्रभावित हुए। यह समन्वित गिरावट बताती है कि यह संपत्ति-विशेष की कमजोरी नहीं, बल्कि बड़ी लिक्विडिटी शॉक है।
Bitcoin ने रिस्क असेट्स में सबसे ज़्यादा गिरावट दिखाई, वहीं सोना और चांदी ने भी महीनों के बाद अपनी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की। इस अनोखे करेलशन से साफ है कि इन्वेस्टर्स जर्बदस्ती अपने पोर्टफोलियो से रिस्क निकाल रहे थे, न कि उनकी इन्वेस्टमेंट प्रेफरेंस बदल गई थी।
आम तौर पर जब क्रिप्टो में स्ट्रेस आता है, तो कैपिटल गोल्ड या कैश की तरफ जाता है। इस बार इन्वेस्टर्स ने हर वह चीज़ बेची जो वे बेच सकते थे।
यह पैटर्न आम तौर पर तब देखने को मिलता है जब लीवरेज अनवाइंड होता है। ट्रेडर्स जिन्हे मार्जिन कॉल आती है, वे सबसे पहले अपने लिक्विड असेट्स (जैसे Bitcoin, गोल्ड और सिल्वर ) को लिक्विडेट कर देते हैं। इस बिक्री के पीछे कोई आइडियोलॉजी नहीं, बल्कि यह एक मैकेनिकल प्रोसेस है।
इस हलचल के केंद्र में US के Monetary Policy को लेकर कन्फ्यूजन है। Federal Reserve ने दिसंबर में quantitative tightening (QT) को रोक दिया था और बैंकों के रिज़र्व स्टेबल करने के लिए शॉर्ट-डेटेड ट्रेज़री बिल्स खरीदना शुरू कर दिया।
जब Fed ने QT रोका, तो उन्होंने फाइनेंशियल सिस्टम से कैश निकालना बंद कर दिया। बैंकों के लिए रिज़र्व अब घट नहीं रहे हैं। हाउसहोल्ड्स और बिजनेस के लिए इससे बैंकिंग सिस्टम में अचानक फंडिंग संकट का रिस्क कम हो जाता है।
शॉर्ट-टर्म गवर्नमेंट डेट खरीदकर, Fed यह पक्का करता है कि बैंकों के पास डेली फंडिंग की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त कैश है और मनी मार्केट्स स्मूदली काम करते रहें।
ये एक्शन फाइनेंशियल सिस्टम की फंक्सनिंग को सपोर्ट करते हैं, न कि मार्केट प्राइसेज़ को। इससे कस्टमर्स के लिए उधार लेना सस्ता नहीं होता, मोर्गेज रेट्स कम नहीं होतीं, न ही रिस्क-टेकिंग को प्रोत्साहन मिलता है।
लॉन्ग-टर्म इंटरेस्ट रेट्स अब भी हाई ही हैं और फाइनेंशियल कंडीशन्स टाइट बनी हुई हैं।
इसी वजह से मार्केट्स ने इस मूव को राहत की जगह छुपे हुए तनाव का संकेत माना।
इस हफ्ते रिलीज़ हुए US लेबर डेटा ने अनिश्चितता और बढ़ा दी। जॉब ओपनिंग लगातार घट रही हैं। हायरिंग स्लो हो गई है। छंटनी बढ़ गई हैं। कंज्यूमर कॉन्फिडेंस 2014 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गई है।
इसी दौरान, बेरोज़गारी अब भी कम है और मंदी पूरी तरह से कम नहीं हुई कि तेजी से रेट में कटौती की जा सके। यही वजह है कि मार्केट स्लोइंग ग्रोथ और टाइट फाइनेंशियल कंडिशंस के बीच फंसी हुई है।
Gold और Silver में गिरावट आई, जबकि अनिश्चितता बढ़ रही थी क्योंकि निवेशकों को cash की जरूरत थी। दोनों एसेट्स ने इस साल की शुरुआत में काफी तेजी दिखाई थी, जिससे ये liquidity जुटाने का आसान जरिया बन गए।
साथ ही, real yields ऊंचे रहे और सेल-ऑफ़ के दौरान dollar मजबूत हो गया। इन वजहों से कीमती धातुओं को शॉर्ट-टर्म में कोई सपोर्ट नहीं मिल सका।
क्रिप्टोकरेंसीज़ ज्यादा तेजी से गिरीं क्योंकि liquidity hierarchy में ये सबसे नीचे आती हैं। जब leverage unwind होता है, तो सबसे पहले crypto बेचा जाता है।
Bitcoin derivatives के डेटा से पता चला कि हाल के हफ्तों में long positions काफी बढ़ चुकी थीं। जैसे-जैसे प्राइस गिरी, liquidations तेज हो गईं। उसी समय ETF inflows भी धीमे हो गए, जिससे डिमांड कम हो गई।
पिछले दो हफ्ते एक ही थीम को दिखाते हैं: markets ने आसान हालात की उम्मीद जल्दी कर ली थी। liquidity इतनी तेज़ी से नहीं बढ़ी कि वो उन दांवों को सपोर्ट कर सके।
नतीजतन, risk assets सभी साथ में correct हुए। इस बदलाव ने crypto, equities और commodities सभी में positionings को reset कर दिया।
यह सेल-ऑफ़ Bitcoin या Gold की लॉन्ग-टर्म hedge के तौर पर फेल होने की निशानी नहीं है। यह सिर्फ एक शॉर्ट-टर्म liquidity stress फेज को दिखाता है, जो अक्सर policy या macro clarity आने से पहले दिखता है।
फिलहाल मार्केट नाजुक बनी हुई है। जब तक liquidity की उम्मीदें stable नहीं होतीं या economic data में साफ कमजोरी नजर नहीं आती, तब तक volatility बनी रह सकती है।
The post US Economy के गिरने से हर मार्केट में गिरावट, ये सिर्फ क्रिप्टो की दिक्कत नहीं appeared first on BeInCrypto Hindi.


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