आधुनिक निवेश की नींव—क्लासिक 60/40 स्टॉक-बॉन्ड पोर्टफोलियो—अब शायद वो सुरक्षित विकल्प नहीं रह गया है जिसपर निवेशक पहले भरोसा करते थे।
कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद से शेयर और बॉन्ड मार्केट तनाव के दौरान साथ-साथ मूव कर रहे हैं। इसने वर्षों पुरानी डाइवर्सिफिकेशन की सुविधा को कमजोर किया है और संस्थागत व रिटेल निवेशकों के लिए एक नया जोखिम भरा माहौल खड़ा कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि पारंपरिक हेजिंग स्ट्रैटेजी की टूटन से फाइनेंशियल मार्केट्स बदल रहे हैं।
इतिहास की बात करें तो बॉन्ड्स गिरती इक्विटी प्राइस के दौरान एक सुरक्षा कवच देते थे। जब स्टॉक मार्केट गिरता था, तो निवेशक ट्रेजरी की ओर जाते थे, जिससे पोर्टफोलियो स्थिर रहता और नुकसान कम होता।
यह उलटा संबंध पेंशन फंड्स, इंश्योरेंस कंपनियों और रिस्क-पैरिटी स्ट्रैटेजीज को आसान वोलटिलिटी अनुमान के साथ ऑपरेट करने देता था।
हालांकि, यह संबंध 2019 के अंत में कमजोर पड़ना शुरू हो गया था और महामारी के समय यह बदलाव तेज हो गया। आज तेज मार्केट सेल-ऑफ़ की स्थिति में स्टॉक्स और बॉन्ड्स दोनों एक साथ गिरते हैं, जिससे नुकसान और वोलटिलिटी और ज्यादा बढ़ जाती है।
इस बदलाव का असर गहरा है। हेज फंड्स और रिस्क-पैरिटी स्ट्रैटेजीज जो पुरानी कोरिलेशन पर भरोसा करते रहे, अब संकट की स्थिति में फोर्स्ड डीलिवरजिंग का सामना कर सकते हैं।
यहां तक कि पारंपरिक रूप से कंजर्वेटिव संस्थाएं (जैसे पेंशन फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियां) भी अब अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव के ज्यादा संपर्क में हैं, जिससे सिस्टमिक जोखिम बढ़ सकता है।
जब पारंपरिक हेज कमजोर पड़ रहे हैं, तो इनवेस्टर्स नॉन-सॉवरेन एसेट्स की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। 2024 की शुरुआत से Gold की कीमत दोगुनी से ज्यादा हो चुकी है, वहीं silver, platinum और palladium हाल के क्वार्टर में तेजी से बढ़े हैं। Swiss franc जैसी करेंसीज़ भी अब सुरक्षित विकल्प के तौर पर इनवेस्टर्स को आकर्षित कर रही हैं।
इस बदलाव के पीछे कई आर्थिक दबाव हैं। बढ़ती हुई बॉन्ड सप्लाई, वित्तीय घाटे को मैनेज करने के लिए, हाई टर्म प्रीमियम, और सेंट्रल बैंक बैलेंस-शीट में स्लो डाउन—इन सबने सॉवरेन डेट की सुरक्षा कमजोर कर दी है।
कई डिवेलप्ड इकोनॉमीज़ में लक्ष्य से ज्यादा inflation ने भी बॉन्ड्स को hedge के तौर पर कम आकर्षक बना दिया है।
IMF का कहना है कि सॉल्यूशन सिर्फ विकल्प खरीदना नहीं है। पॉलिसी मेकर्स को फिस्कल और मॉनेटरी सिस्टम्स में भरोसा फिर से जगाना जरूरी है।
सेंट्रल बैंक मार्केट क्राइसिस में बॉन्ड मार्केट को स्थिर करने के लिए हस्तक्षेप कर सकते हैं। लेकिन ये इमरजेंसी फैसले सीमित होते हैं।
अगर मजबूत फिस्कल डिसिप्लिन और प्राइस स्टेबिलिटी कायम नहीं रहती, तो सॉवरेन बॉन्ड्स turbulent टाइम्स में portfolios को सुरक्षित नहीं कर सकते।
मतलब अब रिस्क को बिल्कुल नई तरह से देखना जरूरी है। Diversification strategies में अब ट्रेडिशनल एसेट्स के बीच बढ़ती correlations को ध्यान में रखना होगा, और portfolios में commodities और प्राइवेट एसेट्स का एक्सपोज़र भी जरूरी है—हालांकि इनके अपने रिस्क हैं।
अब ऑटोमैटिक हेज का दौर खत्म हो गया है। Gold, silver और बाकी नॉन-सॉवरेन वैल्यू स्टोर्स अब सिर्फ diversification तक सीमित नहीं हैं। ये एक अनप्रिडिक्टेबल मार्केट में अहम stabilizer बन रहे हैं।
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