रिपोर्ट्स के अनुसार, CME Group और NYSE की पैरेंट कंपनी Intercontinental Exchange (ICE), US रेग्युलेटर्स पर Hyperliquid पर निगरानी बढ़ाने का दबाव बना रही हैं। उनका कहना है कि इससे मार्केट manipulation और sanctions exposure को लेकर चिंता है।
यह हेडलाइन इसलिए मायने रखती है क्योंकि यह दिखाती है कि पारंपरिक exchanges और तेजी से बढ़ती decentralized finance (DeFi) प्लेटफॉर्म्स के बीच टकराव बढ़ रहा है। दोनों derivatives liquidity और ग्लोबल प्राइस डिस्कवरी के लिए competition कर रहे हैं।
इस चर्चा के केंद्र में Hyperliquid है, जो एक हाई-स्पीड ऑन-चेन derivatives प्लेटफॉर्म है। Hyperliquid 24/7 ट्रेडिंग, डीप liquidity और leveraged perpetual contracts देता है।
Hyperliquid के आने से crypto और commodity-linked futures में CME जैसी बड़ी exchanges की dominance को चुनौती मिली है। इसके सपोर्टर्स का कहना है कि इसकी transparency और blockchain settlement से counterparty risk कम हो जाता है।
क्रिटिक्स का कहना है कि Hyperliquid की permissionless structure के कारण spoofing, wash trading और sanctioned पार्टिसिपेंट्स के एक्सपोजर जैसे ब्लाइंड स्पॉट बन जाते हैं।
कई एनालिस्ट्स गलती से Hyperliquid को exchange बोल देते हैं। जबकि एक exchange सिर्फ buyers और sellers को match करता है और ट्रांजैक्शन fees लेता है, चाहे मार्केट किसी भी direction में जाए।
CME और NYSE मार्केट रिस्क नहीं लेते। उनकी इनकम न्यूट्रल रहती है, यानी ट्रेडर्स के जीतने या हारने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
Hyperliquid का स्ट्रक्चर अलग है। यह सिर्फ न्यूट्रल इंफ्रास्ट्रक्चर की तरह नहीं चलता, बल्कि liquidity को अपने internal vault HLP (Hyperliquidity Provider) के जरिए route करता है।
HLP, मार्केट मेकिंग strategies से liquidity देता है, liquidations को handle करता है, Earn में USDC सप्लाई करता है और ट्रेडिंग फीस कमाता है। असल में यह ट्रेडर्स का counterparty बन जाता है।
इसका मतलब है कि रिश्ता असिमेट्रिक है: जब ट्रेडर्स हारते हैं तो HLP को प्रॉफिट होता है, और जब ट्रेडर्स जीतते हैं तो HLP को नुकसान। इस वजह से HLP की परफॉर्मेंस सीधे ट्रेडर्स की आउटकम से जुड़ी हुई रहती है, जबकि पारंपरिक exchanges directional-neutral होते हैं।
Hyperliquid हर महीने करीब $65 मिलियन फीस जेनेरेट करता है, यानी करीब $700 मिलियन सालाना।
इस revenue का बड़ा हिस्सा HYPE टोकन buybacks में Assistance Fund के माध्यम से जाता है। यानी ट्रेडिंग एक्टिविटी से फीस बनती है, फीस buybacks पर लगती है, buybacks टोकन की प्राइस को सपोर्ट करते हैं, और प्राइस बढ़ने से ट्रेडिंग और बढ़ती है। यह एक reinforcिंग लूप है।
पारंपरिक exchanges अभी भी फिक्स्ड ट्रेडिंग hours में ही काम करती हैं, जबकि Hyperliquid लगातार 24/7 चलता है। यह फर्क तब और अहम हो जाता है जब मार्केट वोलैटाइल रहते हैं, क्योंकि ऐसे में प्राइस डिस्कवरी का फोकस crypto-native venues की ओर शिफ्ट हो जाता है, खासकर जब पारंपरिक मार्केट्स बंद होते हैं।
इसका नतीजा ये हुआ है कि मौजूदा कंपनियों पर अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को मॉडर्नाइज़ करने और ट्रेडिंग विंडो को बढ़ाने का दबाव बढ़ता जा रहा है ताकि वे प्रतियोगिता में बनी रह सकें।
US रेग्युलेटर्स, जिनमें CFTC भी शामिल है, पहले ही ऑफशोर और डिसेंट्रलाइज्ड डेरिवेटिव्स प्लेटफॉर्म्स की तरफ ज्यादा ध्यान देने के संकेत दे चुके हैं।
भले ही Hyperliquid के खिलाफ कोई औपचारिक कार्रवाई घोषित नहीं हुई है, लेकिन मौजूदा बहस कंप्लायंस स्टैंडर्ड्स, इन्वेस्टर प्रोटेक्शन, और परमिशनलेस मार्केट्स में फाइनेंशियल स्टेबिलिटी को लेकर व्यापक चिंताओं को दर्शाती है।
अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि रेग्युलेटर्स डिसेंट्रलाइज्ड डेरिवेटिव्स के लिए टार्गेटेड रूल्स लाते हैं या ऑन-चेन प्लेटफॉर्म्स में मौजूदा फ्यूचर्स मार्केट फ्रेमवर्क को बढ़ाते हैं।
फिर भी, Wall Street इन्फ्रास्ट्रक्चर और DeFi लिक्विडिटी के बीच की लड़ाई अब थ्योरी से निकलकर रेग्युलेटरी प्राथमिकता बनती जा रही है, और इसके नतीजे वैश्विक डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग स्ट्रक्चर को बदल सकते हैं।
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