क्रिप्टोकरेन्सी सालों से सिर्फ इन्वेस्टमेंट कैटेगरी से बाहर निकलकर डेली फाइनेंस लाइफ में कदम रखने की कोशिश कर रहा है। पेमेंट्स ने इसमें सबसे ज्यादा प्रोग्रेस दिखाई है, खासकर stablecoins के जरिए। लेंडिंग और collateral-based फाइनेंस अगला बड़ा ग्रोथ एरिया हो सकते हैं, जिसमें क्रिप्टो होल्डिंग्स का उपयोग क्रेडिट प्रोडक्ट्स, बिजनेस लोन या बड़े लाइफ ट्रांजेक्शन्स के लिए किया जा सकता है।
BeInCrypto ने Gate के Chief Business Officer Kevin Lee और Zoomex के Marketing Director Fernando Aranda से बात की कि अभी क्रिप्टो पारंपरिक फाइनेंस के कहां तक पहुँच चुका है, डिजिटल असेट्स मॉर्गेज या लोन सपोर्ट करने से पहले क्या बदलाव जरूरी हैं, और गंभीर रिस्क कहां आते हैं।
Stablecoins ने पहले ही क्रिप्टो को वर्किंग पेमेंट्स यूज केस दिया है। ये उपयोगकर्ताओं और कंपनियों को $ में वैल्यू बॉर्डर के पार कम friction के साथ ट्रांसफर करने देते हैं, जो कि पुराने सिस्टम्स से आसान है। फिर भी Aranda मानते हैं कि लेंडिंग में सबसे बड़ा मौका छुपा है।
“Payments पहले ही solve हो चुका है। Stablecoins ने ये प्रूव कर दिया है। लेकिन असली पोटेंशियल लेंडिंग में है,” Aranda ने कहा। “Crypto collateral को programmable asset बना देता है, जिससे बिना ट्रेडिशनल गेटकीपर्स के इंस्टेंट, ग्लोबल क्रेडिट पॉसिबल हो जाती है। असली disruption और मार्जिन वहीं है।”
उनका नजरिया क्रिप्टो के पेमेंट टूल और फाइनेंशियल collateral के यूज के बीच फर्क बताता है। पेमेंट settlement को बेहतर बनाता है। लेंडिंग, यूजर्स को क्रेडिट एक्सेस देने का तरीका बदल देती है।
किसी भी क्रिप्टो होल्डर के लिए, थ्योरी में, बिना असेट्स बेचे liquidity अनलॉक करना पॉसिबल है। ये high-net-worth holders, crypto-native कंपनियों, माइनर्स, फाउंडर्स और बड़े digital asset पोर्टफोलियो वाले इन्वेस्टर्स के लिए खास तौर पर आकर्षक है। इसके अलावा, भारत जैसी जगहों पर जहां फॉर्मल क्रेडिट उपलब्ध नहीं है, वहाँ के यूजर्स के लिए भी ये एक नया रास्ता है।
चुनौती ये है कि इस मॉडल को मेनस्ट्रीम फाइनेंसियल प्रोडक्ट्स के लिए इतना रिलायबल बनाया जाए। एक छोटा क्रिप्टो-बैक्ड लोन और एक हाउसिंग लोन बिल्कुल अलग रिस्क कैटेगरी में आते हैं। मॉर्गेज, लॉन्ग रिपेमेंट पीरियड, स्टेबल collateral मॉडल और कंज्यूमर प्रोटेक्शन रूल्स पर निर्भर करता है। जबकि क्रिप्टो मार्केट्स में अभी भी जबरदस्त प्राइस मूवमेंट और uneven liquidity चल रही है, जिससे लॉन्ग-टर्म क्रेडिट डिज़ाइन काफी मुश्किल हो जाती है।
क्रिप्टो मॉर्गेज जैसे प्रोडक्ट्स को सपोर्ट करने से पहले, बैंकों और लेंडर्स को सिर्फ यूजर डिमांड से ज्यादा चाहिए। उन्हें लीगल क्लैरिटी, ट्रस्टेड कस्टडी, कंसिस्टेंट वैल्यूएशन और ऐसे रिस्क कंट्रोल्स चाहिए जो मार्केट स्ट्रेस में भी टिक पाए।
Aranda ने इन जरूरतों को तीन एरियाज में समरी किया।
“प्राइस स्टेबिलिटी, रेग्युलेटरी क्लैरिटी, और ट्रस्टेड कस्टडी फ्रेमवर्क्स,” उन्होंने कहा। “Banks क्रिप्टो को रिजेक्ट नहीं करते हैं। वे वोलैटिलिटी और लीगल अनसर्टेनटी को रिजेक्ट करते हैं। जब ये चीज़ें मैनेज हो जाती हैं, तो क्रिप्टो बस एक और तरह का कोलेट्रल बन जाता है, कोई स्पेशल केस नहीं।”
यही पारंपरिक लेंडर्स के लिए सबसे जरूरी पॉइंट है। कोलेट्रल तभी काम करता है जब उसकी वैल्यू पता हो, उसे जब्त किया जा सके, लिक्विडेट किया जा सके और एक रेग्नाइज्ड लीगल प्रोसेस के तहत एकाउंट किया जा सके। रियल एस्टेट, सिक्योरिटीज और कैश पहले से ही इस स्टेबलिश्ड सिस्टम में फ़िट होते हैं। क्रिप्टोकरेन्सी को अभी भी कस्टडी, कोलेट्रल राइट्स, लिक्विडेशन प्रोसीजर्स और बॉरोअर डिस्क्लोजर के लिए कंसिस्टेंट स्टैंडर्ड्स की जरूरत है।
Mortgage सेक्टर में बात और भी सेंसिटिव हो जाती है। लेंडर्स को इनकम, रीपेमेन्ट एबिलिटी, प्रॉपर्टी वैल्यू और कोलेट्रल क्वालिटी का अनुमान लगाना पड़ता है। अगर क्रिप्टो होल्डिंग्स भी इसमें जुड़ती हैं, तो लेंडर को तय करना होता है कि उसकी कितनी वैल्यू मानी जाए, कितना हेयरकट लगाया जाए, और डाउनटर्न के समय एसेट कितनी जल्दी लिक्विडेट की जा सकती है।
अगर कोई बॉरोअर $500,000 की Bitcoin होल्डिंग रखता है, तो बुल मार्केट में उसकी बैलेंस शीट मजबूत दिख सकती है। लेकिन शार्प ड्रॉडाउन के बाद यही पोजीशन बिलकुल अलग नजर आ सकती है। क्रिप्टो को बड़े लोन के लिए यूज़ करने के लिए, फाइनेंशियल सिस्टम को ऐसी वोलैटिलिटी मैनेज करने के तरीके चाहिए जो बॉरोअर को अचानक लिक्विडेशन स्पाइरल में न धकेल दें।
क्रिप्टो-बैक्ड लोन की शुरुआत उन एसेट होल्डर्स के लिए हुई थी जो लिक्विडिटी तो चाहते थे पर सेल नहीं करना चाहते थे। Aranda को उम्मीद है कि जैसे जैसे मार्केट सिस्टम mature होंगे, शुरुआत का ये स्टेज भी बदलेगा।
“ये High Net Worth Individuals (HNWIs) से शुरू होता है, लेकिन सिर्फ वहीं नहीं रुकेगा,” उन्होंने कहा। “जैसे-जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर मच्योर होता है, ये एक मेनस्ट्रीम क्रेडिट लेयर बन जाएगा, खासकर उन रीजन में जहां ट्रेडिशनल बैंकिंग कम पहुंचती है। असली बदलाव क्रेडिटवर्थीनेस से कोलेट्रल एफिशिएंसी की ओर है।”
मेनस्ट्रीम के मामले में सबसे जरूरी है एक्सेसिबिलिटी और सेफ्टी। क्रिप्टो-बैक्ड क्रेडिट तब आम यूजर्स के लिए फायदेमंद होगा जब कोलेट्रल मैनेजमेंट सिंपल, ट्रांसपेरेंट और रेग्युलेटेड होगा। यूजर्स को लिक्विडेशन रिस्क, इंटरेस्ट रेट, कोलेट्रल रिक्वायरमेंट्स और प्राइस ड्रॉप्स का उनके लोन पर असर अच्छे से पता होना चाहिए।
निकट भविष्य के लिए छोटे क्रेडिट प्रोडक्ट्स हाउसिंग फाइनेंस से पहले ज्यादा मजबूत यूज़ केसेज दे सकते हैं। इसमें बिजनेस क्रेडिट, शॉर्ट-टर्म लिक्विडिटी, सिक्योर पर्सनल लोन या stablecoins से लिंक्ड पेमेंट प्रोडक्ट्स आ सकते हैं। ऐसे प्रोडक्ट्स शॉर्ट ड्यूरेशन और कम एक्सपोजर के साथ रिस्क मॉडल्स को टेस्ट कर सकते हैं, जिससे क्रिप्टो को बड़े फाइनेंशियल डिसीजन का हिस्सा बनाने से पहले अच्छा अनुभव मिल सके।
इमर्जिंग मार्केट्स में क्रिप्टो-बैक्ड क्रेडिट उन यूजर्स के लिए भी काम आ सकता है जिनके पास एसेट्स तो हैं लेकिन बैंकिंग एक्सेस लिमिटेड है। कोई यूजर अगर stablecoins या बड़े क्रिप्टो एसेट्स होल्ड करता है, तो वह उन एसेट्स को कोलेट्रल की तरह इस्तेमाल कर सकता है, बिना किसी लोकल क्रेडिट ब्यूरो पर डिपेंड हुए। इससे एक्सेस बढ़ सकता है, हालांकि कंज़्यूमर प्रोटेक्शन भी उसी हिसाब से मजबूत होना चाहिए।
Kevin Lee के अनुसार, वोलैटिलिटी क्रिप्टो को रोजमर्रा के फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स में लाने का सबसे बड़ा रिस्क है। हाउसिंग लोन और कंज़्यूमर क्रेडिट जैसे प्रोडक्ट्स प्रेडिक्टेबल कोलेट्रल वैल्यू पर डिपेंड करते हैं। क्रिप्टो उन एसंप्शंस को कुछ घंटों में ही बदल सकता है।
“सबसे बड़ा रिस्क यही है कि क्रिप्टो ऐसे फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स में हाई वोलैटिलिटी लाता है, जो स्टेबिलिटी पर डिपेंड करते हैं,” Lee ने कहा। “जब कोलेट्रल कुछ घंटों में ही शार्पली मूव कर सकता है, तो रिजायनेबल हेयरकट, मार्जिन लेवल और लिक्विडेशन थ्रेशहोल्ड सेट करना बहुत मुश्किल हो जाता है।”
यह प्रॉब्लम तब और भी सीरियस हो जाती है जब क्रिप्टो स्ट्रेस ट्रेडिशनल क्रेडिट प्रोडक्ट्स में फैल जाता है। Lee ने “रिस्क ट्रांसमिशन चैनल” का वॉर्निंग दी, जिसमें क्रिप्टो मार्केट का स्ट्रेस हाउसिंग या लेंडिंग स्ट्रक्शर तक पहुंच सकता है, खासकर डाउनटर्न के समय।
उन्होंने लिक्विडिटी फ्रैग्मेंटेशन और प्राइस डिस्टॉर्शन को भी अतिरिक्त रिस्क बताया। शांत मार्केट्स में क्रिप्टो कोलेटरल का प्राइस पता करना और उसे बेचना आसान लगता है। लेकिन जब मार्केट पर प्रेशर आता है, तो लिक्विडिटी अचानक खत्म हो सकती है, अलग-अलग जगहों पर प्राइस अलग हो सकते हैं, और एग्जीक्यूशन क्वालिटी भी कमजोर हो सकती है।
Aranda ने भी इसी तरह की चेतावनी दी, जिसमें उन्होंने लीवरेज और इंटरमीडिएरीज़ पर फोकस किया।
“वोलेटिलिटी बात सभी करते हैं, लेकिन यही सबसे बड़ा रिस्क नहीं है,” उन्होंने कहा। “असल रिस्क्स लिक्विडिटी शॉक, छुपा हुआ लीवरेज, और ओपेक इंटरमीडिएरीज़ पर ज्यादा निर्भर रहना हैं। अगर क्रिप्टो पारंपरिक फाइनेंस वाली कमज़ोरियों को सिर्फ तेज़ी से दोहराती है, तो कुछ भी बेहतर नहीं हुआ।”
यही वह जगह है जहां प्रोडक्ट डिज़ाइन बहुत जरूरी बन जाती है। क्रिप्टो-बैक्ड फाइनेंसिंग स्पीड और ग्लोबल एक्सेस दे सकती है, लेकिन कमजोर डिज़ाइन वाले प्रोडक्ट्स मार्केट गिरावट को जबरदस्ती डीलिवरेजिंग में बदल सकते हैं। ऐसे में एसेट की प्राइस गिरने से मार्जिन कॉल्स ट्रिगर हो सकते हैं, जिसकी वजह से लिक्विडेशन हो सकते हैं, और इससे प्राइस पर और दबाव आ सकता है।
कंज्यूमर की समझ भी एक कमजोर कड़ी है। कई यूज़र्स को प्राइस मूवमेंट की समझ हो सकती है, पर लिक्विडेशन मैकेनिक, कोलेटरल रेशियो या ऑटोमेटेड रिस्क कंट्रोल्स की जानकारी नहीं होती। आम क्रेडिट प्रोडक्ट्स के लिए सिंपल डिस्क्लोज़र और कन्जर्वेटिव डिज़ाइन चाहिए, खासकर जब यूज़र वॉलेटाइल एसेट्स को अपनी बड़ी ज़िंदगी की जरूरतों से जोड़ते हैं।
क्रिप्टो का रोल हमारी डेली फाइनेंस में सबसे पहले स्टेबलकॉइन पेमेंट्स और कोलेटरल-बेस्ड लेंडिंग के ज़रिए बढ़ेगा। पेमेंट्स में पहले से ही प्रोडक्ट-मार्केट फिट बना हुआ है, खासकर क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसफर और डिजिटल सेटलमेंट में। लेंडिंग में लॉन्ग-टर्म ग्रोथ की ज्यादा संभावना है, क्योंकि ये क्रिप्टो होल्डिंग्स को फाइनेंशियल कोलेटरल में बदल देता है।
बड़ी लाइफ ट्रांजैक्शंस के लिए रास्ता थोड़ा स्लो रहेगा। मॉर्टगेज और बड़े लोन के लिए स्टेबिलिटी, लीगल क्लैरिटी, कस्टडी स्टैंडर्ड्स और उन रिस्क कंट्रोल्स की जरूरत होती है जो सीरियस मार्केट कंडीशन्स के लिए बने हों। इसमें बड़ा मौका है, लेकिन उतना ही बड़ा रिस्क भी। क्रिप्टो क्रेडिट को ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकता है, लेकिन तभी जब प्रोडक्ट डिज़ाइन के सेंटर में वोलेटिलिटी, लिक्विडिटी, लीवरेज और कंज्यूमर प्रोटेक्शन को रखा जाए।
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