रियल-वर्ल्ड एसेट (RWA) टोकनाइजेशन को अक्सर ट्रिलियन डॉलर के अवसर के रूप में देखा जाता है। लेकिन इंडस्ट्री लीडर्स के हाल ही के BeInCrypto X Space में बातचीत के मुताबिक, सबसे बड़ी बाधा न तो डिमांड है और न ही टेक्नोलॉजिकल कैपेबिलिटी — असली चुनौती यह है कि संस्थागत खिलाड़ी एक fragmentated, क्रॉसचेन एनवायरनमेंट में फेल्योर रिस्क को कैसे आंकते हैं।
यह चर्चा BeInCrypto’s Online Summit 2026 के तहत आयोजित की गई थी। यह समिट डिजिटल फाइनेंस के सामने मौजूद इन्फ्रास्ट्रक्चर चुनौतियों को समझने के लिए रखा गया व्यापक कार्यक्रम था। इस पैनल को 8lends के जनरल पार्टनरशिप में होस्ट किया गया था, जिसमें मुख्य फोकस यह था कि RWAs को एक्सपेरिमेंटल डिप्लॉयमेंट्स से इन्स्टीट्यूशनल-स्केल एडॉप्शन तक कैसे ले जाया जा सकता है।
जहाँ टोकनाइज्ड यील्ड प्रोडक्ट्स पहले ही ऑन-चेन कैपिटल को आकर्षित कर रहे हैं, वहीं स्पीकर्स ने माना कि संस्थागत लेवल पर बड़ी भागीदारी तभी देखने को मिलेगी जब इंटरऑपरेबिलिटी फ्रेमवर्क्स सिस्टम फेल्योर की स्थिति में भी प्रेडिक्टेबल रिज़ल्ट दे सकें — सिर्फ तब नहीं जब सबकुछ ठीक से काम कर रहा हो।
इस पैनल में Alex Zinder (CPO, Blockdaemon), Graham Nelson (DeFi Product Lead, Centrifuge), Aravindh Kumar (Business Lead, Avail), Aishwary Gupta (Global Head of Payments and RWAs, Polygon Labs), और Ivan Marchena (Chief Communications Officer, 8lends) शामिल थे। इसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स, RWA प्लेटफॉर्म्स और क्रॉसचेन स्पेशलिस्ट्स का नजरिया सामने आया।
पूरे डिस्कशन में पैनलिस्ट्स एक ही थीम पर बार-बार लौटे: क्रिप्टो-नेटिव टूलिंग तेजी से बढ़ी है, लेकिन संस्थागत फाइनेंस रिस्क का मूल्यांकन बिलकुल अलग नजरिए से करता है।
Space के दौरान एक बड़ा फर्क यह बात सामने आया कि इंस्टीट्यूशन्स नए फाइनेंशियल इन्फ्रास्ट्रक्चर को किस तरह आंकते हैं।
यह सवाल मल्टी-चेन RWA एनवायरनमेंट में और भी अहम बन जाता है। आज क्रॉसचेन rails stablecoins और क्रिप्टो एसेट्स को efficiently ट्रांसफर करती हैं, लेकिन इंस्टीट्यूशन्स को गवर्नेंस, अकाउंटबिलिटी और फेल्योर के बाद रिकवरी के रास्तों पर क्लैरिटी चाहिए।
ब्लॉकचेन में fragmentation कोई अस्थायी परेशानी भर नहीं है।
“Fragmentation टेक्निकल दिक्कत नहीं, बल्कि इकनॉमिक टैक्स है,” Ivan Marchena, CCO, 8lends ने कहा।
Marchena के मुताबिक, जब टोकनाइज्ड एसेट्स ऐसे ब्लॉकचेन पर फैले होते हैं जो seamless इंटरऑपरेट नहीं करते, तो लिक्विडिटी अलग-अलग सिलोज़ में बंट जाती है, प्राइसिंग में अंतर आ जाता है, और कैपिटल एफिशिएंसी पर असर पड़ता है। भले ही RWAs ट्रिलियन डॉलर स्केल तक पहुँच जाएं, fragmentation उनकी इफेक्टिवनेस को काफी कम कर सकता है।
कई स्पीकर्स ने इस बात पर ज़ोर दिया कि fragmentation खुद खत्म नहीं होने वाली है। इसके बजाय, जीतने वाले प्लेटफॉर्म वे होंगे जो इसे end users से छुपा लेंगे — बिलकुल वैसे ही जैसे इंटरनेट एक सिंगल नेटवर्क पर निर्भर नहीं करता, बल्कि standardized protocols का उपयोग करता है।
Polygon की पर्सपेक्टिव से देखे तो, सिर्फ interoperability ही चैलेंज नहीं है, बल्कि execution risk को कैसे संभाला जाता है, यह भी बड़ा मुद्दा है।
Polygon Labs के Aishwary Gupta ने intent-based architectures को एक ऐसा तरीका बताया जिसके जरिए institutions बिना पूरा execution risk लिए भी एंगेज हो सकते हैं।
Gupta ने आगे बताया कि इस अप्रोच की वजह से institutions पब्लिक ब्लॉकचेन liquidity तक पहुँच सकते हैं, साथ में compliance, data localization और settlement guarantees जैसी कंट्रोल्स भी बनाए रख सकते हैं — ये वो factors हैं जो सिर्फ पब्लिक infrastructure पर भरोसा करने वाले institutions के pilots को अक्सर धीमा कर देते हैं।
Structural मुश्किलों के बावजूद, पैनल ने माना कि real world asset (RWA) एडॉप्शन खास इलाकों में हो रहा है। Yield-bearing products — खासकर tokenized Treasuries, money market instruments, और private credit — इस समय ऑनचेन एडॉप्शन में लीड कर रहे हैं।
Nelson ने कहा कि DAOs और stablecoin issuers अब ज़्यादा से ज़्यादा RWA में allocation कर रहे हैं ताकि क्रिप्टो-नेटिव strategies से हटकर yield में diversification लाया जा सके। इससे yield-focused RWA, traditional finance और DeFi के बीच नेचुरल ब्रिज बन रहा है।
Zinder ने भी इस बात को दोहराया। उनका मानना है कि जो use cases सुर्खियां नहीं बटोरते, वो ज्यादा complicated asset classes से तेज़ी से स्केल कर सकते हैं।
पैनल ने smart contracts, automation और emergency controls को लेकर रेग्युलेटरी कंसरन पर भी चर्चा की, खासकर यूरोप में।
स्पीकर्स ने ये भी कहा कि pause mechanisms डिसेंट्रलाइजेशन को कमजोर नहीं बनाते, बल्कि इसी तरह के safeguards ट्रेडिशनल markets में पहले से मौजूद हैं।
जैसे-जैसे RWA ज़्यादा automated और interconnected होते जाएंगे, institutions तभी बड़े स्केल पर capital लगाएंगे जब वे downside scenarios को confidence के साथ model कर पाएंगे।
पैनलिस्ट्स ने बताया कि पारंपरिक फाइनेंस से क्रिप्टो में एकतरफा बदलाव के बजाय, RWAs दो-तरफा पूंजी फ्लो को सक्षम बना रहे हैं।
पारंपरिक संस्थान अब ऑन-चेन यील्ड के लिए staking और लेंडिंग को अपना रहे हैं, वहीं क्रिप्टो-नेटिव पूंजी भी अब तेजी से real-world इनकम स्ट्रीम्स में exposure ले रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स, दोनों दिशाओं के लिए एक जैसी बेसिक पाइपलाइन बना रहे हैं।
फिलहाल, टोकनाइज्ड यील्ड प्रोडक्ट्स एडॉप्शन लीड करने के लिए सबसे बेहतर पोजिशन में नजर आ रहे हैं। लेकिन बड़े RWA मार्केट को अनलॉक करना इस बात पर निर्भर करेगा कि interoperability एक क्रिप्टो-नेटिव कन्वीनियंस से आगे बढ़कर क्या इंस्टिट्यूशनल-ग्रेड रिस्क फ्रेमवर्क बन पाता है या नहीं।
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