इंडस्ट्रियल मेटल्स अचानक चीन में सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाले ट्रेड्स में शामिल हो गए हैं, जहां एल्युमिनियम, कॉपर, निकिल और टिन के फ्यूचर्स वॉल्यूम में तेज़ उछाल आया है क्योंकि रिटेल ट्रेडर्स मार्केट में जमकर निवेश कर रहे हैं।
इस अचानक आई एक्टिविटी ने एक्सचेंज और रेग्युलेटर्स को बार-बार हस्तक्षेप के लिए मजबूर कर दिया है, जिससे ये चिंता बढ़ गई है कि मूलभूत बातों की बजाय अटकलें (speculation) प्राइस और वोलाटिलिटी को चला रही हैं।
हालिया मार्केट डेटा दिखाता है कि बेस मेटल्स में ट्रेडिंग एक्टिविटी बहुत तेज़ रफ्तार से बढ़ी है। शंघाई फ्यूचर्स एक्सचेंज पर एल्युमिनियम, कॉपर, निकिल और टिन के फ्यूचर्स वॉल्यूम महीने-दर-महीने काफी बढ़े हैं, और ये लेवल हाल के औसत से काफी ज्यादा हैं।
निकिल कॉन्ट्रैक्ट्स ने इस तेजी की अगुवाई की, एक ही महीने में ट्रेडिंग वॉल्यूम कई गुना बढ़ गया। टिन मार्केट्स में भी जबरदस्त एक्टिविटी देखी गई, कई बार डेली ट्रैकिंग वॉल्यूम फिजिकल कंज़म्पशन बेंचमार्क से भी काफी ऊपर चला गया।
यह ट्रेंड दिखाता है कि डेरिवेटिव्स speculation मार्केट पर हावी है, इंडस्ट्रियल डिमांड के मुकाबले रिटेल पार्टिसिपेशन एक बड़ा कारण बनकर उभरा है।
मेटल्स ट्रेडिंग अभी चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और WeChat ट्रेडिंग ग्रुप्स में बेहद ट्रेंडिंग टॉपिक बना हुआ है।
यह पैटर्न वही ट्रेंड दिखाता है जो पहले इक्विटी, क्रिप्टो और कमोडिटीज़ में दिखा था, जहां रिटेल का जोश प्राइस मूवमेंट को जल्दी-जल्दी बड़ा बना देता है।
इस तेजी की रफ्तार ने एक्सचेंज को दखल देना मजबूरी कर दिया है। पिछले कुछ हफ्तों में शंघाई और रीजनल फ्यूचर्स मार्केट्स ने बार-बार मार्जिन रिक्वायरमेंट्स बढ़ाए हैं और ट्रेडिंग नियमों को टाइट किया है।
यह असामान्य लेकिन बार-बार होने वाला हस्तक्षेपों का सेट जरूरत से ज़्यादा लीवरेज को लेकर बढ़ती चिंता के संकेत दे सकता है। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे कदमों का इस्तेमाल आमतौर पर तब किया गया है जब प्राइस मूवमेंट्स सप्लाई और डिमांड के बेसिक फैक्टर्स से अलग होकर स्पेकुलेटिव इनफ्लो को कंट्रोल और मार्केट्स को स्टेबल करने के लिए जरूरी हो जाता है।
हालांकि, बार-बार सख्ती देखने से ये बात भी सामने आती है:
तेज़ स्पेकुलेटिव ग्रोथ के पीरियड्स अक्सर शार्प करेक्शन से पहले आते हैं, खासतौर पर हाई लीवरेज्ड डेरिवेटिव्स मार्केट्स में।
इसी के साथ, पूरा मेटल्स कॉम्प्लेक्स मिक्स्ड सिग्नल्स दे रहा है। खासकर सिल्वर ने अब तक के सबसे जबरदस्त रैलीज़ में से एक देखी है – पिछले एक साल में सिल्वर की प्राइस बहुत ऊपर गई, और अब वह ज्यादा वॉलैटाइल कंसोलिडेशन फेज में है।
ऐसे माहौल में, कुछ स्ट्रैटेजिस्ट्स का मानना है कि सिल्वर और अन्य मेटल्स की प्राइस ब्रॉडर कमोडिटी इंडेसेज के मुकाबले बहुत आगे निकल चुकी है। इससे पहले के साइक्ल्स में जब ऐसा हुआ, उसके बाद प्राइस कूलिंग देखने को मिली थी।
दूसरी ओर, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्ट्रक्चरल सप्लाई कंस्ट्रेंट्स और इंडस्ट्रियल डिमांड, खासकर एनर्जी ट्रांजिशन टेक्नोलॉजी से, प्राइस को लॉन्ग-टर्म में ऊँचा बनाए रख सकते हैं।
विचारों में ये अंतर दिखाता है कि मार्केट स्ट्रक्चरल ट्रेंड्स और स्पेकुलेटिव एक्सेस में फर्क करने की कोशिश कर रहा है।
रिटेल स्पेकुलेशन से आगे, मेटल्स की यह तेजी बड़े मैक्रोइकोनॉमिक बदलावों के बीच आ रही है। China लगातार US Treasuries होल्डिंग्स कम कर रहा है और गोल्ड रिज़र्व्स बढ़ा रहा है।
इससे यह धारणा मजबूत होती है कि ग्लोबल कैपिटल अब ट्रेडफाई असेट्स से दूर होकर डायवर्सिफिकेशन की तरफ जा रहा है।
The People’s Bank of China ने लगातार महीनों तक गोल्ड जमा करने की रिपोर्ट दी है, और पिछले कुछ सालों में कई दूसरे सेंट्रल बैंक भी यही ट्रेंड फॉलो कर रहे हैं।
ये मैक्रो ट्रेंड्स सीधे तौर पर रिटेल-ड्रिवन इंडस्ट्रियल मेटल्स ट्रेडिंग में आई तेजी को नहीं समझाते, लेकिन ये एक बड़ा नैरेटिव बनाते हैं जिसमें इन्वेस्टर्स अलग-अलग लेवल्स पर—इंडिविजुअल्स से लेकर सॉवरेन इंस्टीट्यूशंस तक—रिस्क, लिक्विडिटी और पोर्टफोलियो में हार्ड एसेट्स की भूमिका को दोबारा देख रहे हैं।
रिटेल सट्टेबाजी, टाइट होते एक्सचेंज कंट्रोल्स और मिक्स्ड मैक्रो सिग्नल्स के चलते वोलैटिलिटी आने वाले महीनों में ज्यादा बनी रह सकती है।
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